
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर बनी बायोपिक “अजेय” की स्क्रीनिंग से पहले ही उसका स्क्रीन ब्लॉक हो गया है।
निर्माता सम्राट सिनेमैटिक्स फिल्म रिलीज़ करना चाहते हैं, लेकिन सेंसर बोर्ड (CBFC) ने फिल्म को इतनी बार रिव्यू किया है, जितनी बार रेलवे मीटिंग में चाय सर्व होती है।
प्रेरणा और प्रक्रिया में फर्क होता है
निर्माताओं का दावा है कि ये फिल्म शांतनु गुप्ता की पुस्तक “The Monk Who Became Chief Minister” से प्रेरित है और इसका उद्देश्य युवाओं को मोटिवेट करना है।
लेकिन CBFC को लगता है कि ये प्रेरणा इतनी शक्तिशाली है कि इससे सामाजिक “पारंपरिक संतुलन” हिल सकता है।
सेंसर बोर्ड: पहले दिखाओ, फिर सोचेंगे
सीबीएफसी की तरफ से एक महीना इंतज़ार कराने के बाद भी फिल्म ना देखना, फिर अचानक “आपत्तिजनक” बता देना कुछ ऐसा ही है जैसे कोई टीचर बिना कॉपी पढ़े फेल कर दे।
जब हाईकोर्ट ने पूछा – “फिल्म देखी?”
सीबीएफसी बोला – “नहीं, लेकिन हमें लगता है इससे समाज भड़क सकता है।”
बॉम्बे हाईकोर्ट का जवाब: पहले पॉपकॉर्न लाओ!
अब कोर्ट खुद फिल्म देखने वाला है – जी हां, सच में!
न्यायाधीशों ने कहा, “हम खुद फिल्म देखेंगे और फिर तय करेंगे कि अजेय वास्तव में ‘अजेय’ है या नहीं।”
25 अगस्त को अगली सुनवाई होगी और उम्मीद है कि तब तक जज लोग इंटरवल में समोसे खा चुके होंगे।
CBFC बनाम तर्क – युद्ध जारी है
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29 आपत्तियाँ उठाई गईं
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8 आपत्तियाँ हटाईं
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टाइटल पर आपत्ति: “अजेय” कुछ ज़्यादा अजेय लग रहा था
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संवादों पर आपत्ति: “यह संवैधानिक पद पर है, आपत्तिजनक है”

अब सवाल ये है – क्या सेंसर बोर्ड समाज का गार्डियन है या विचारों का सिक्योरिटी गार्ड?
निर्माताओं की बात – “हम बस फिल्म रिलीज़ करना चाहते हैं, NOC नहीं!”
निर्माताओं का कहना है कि सेंसर बोर्ड ने “निजी व्यक्ति” से NOC मांगकर उनका मौलिक अधिकार कुचल दिया।
अब पूछना पड़ेगा – क्या अब से हर बायोपिक में कैरेक्टर की सहमति ज़रूरी होगी? तो फिर “संजू” कैसे बनीं?
कोर्ट ने सेंसर बोर्ड से क्या कहा?
“आपने फिल्म देखे बिना कैसे रिजेक्ट कर दी?
आपने नैचुरल जस्टिस का पालन नहीं किया।”
कोर्ट ने अब खुद फिल्म देखने की जिम्मेदारी ली है –
अब लग रहा है “जस्टिस फॉर अजेय” की स्क्रिप्ट लिखी जा रही है।
“अजेय” फिल्म को मिलेगा न्याय या सेंसर का नया कट?
बॉम्बे हाईकोर्ट का अगला एपिसोड (सुनवाई) 25 अगस्त को प्रसारित होगा। तब तक “अजेय” अपनी बायोपिक के असली हीरो की तरह संघर्ष कर रहा है – बिना NOC, बिना ट्रेलर रिलीज़ और बिना स्क्रीनिंग के।
क्या आपको लगता है कि बायोपिक को रिलीज़ से पहले NOC लेना चाहिए? या सेंसरशिप का ये नया चेहरा अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला है?
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